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दोनों पैरों से दिव्यांग, लेकिन हौसले बुलंद! धनपुरा के सूरज की संघर्ष भरी जिंदगी, मेहनत से पाल रहे परिवार; सरकारी राशन और बैटरी ट्राइसाइकिल के लिए लगा रहे गुहार

समाजसेवी मोहम्मद सलीम ने बढ़ाया मदद का हाथ, सूरज को ट्राइसाइकिल और राशन कार्ड दिलाने का भरोसा

By गुलज़ार अहमद | Friday, 06 Nov 2026 Global Star News
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(रिपोर्ट: गुलज़ार अहमद)- हरिद्वार ग्रामीण (धनपुरा)। कहते हैं कि इंसान के हौसले बुलंद हों तो शारीरिक चुनौतियां भी उसके कदम नहीं रोक सकतीं। जिंदगी में कितनी भी मुश्किलें क्यों न हों, अगर कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो इंसान हर परिस्थिति से लड़ सकता है। ऐसी ही मिसाल ग्राम पंचायत धनपुरा निवासी सूरज पुत्र श्री रमन पेश कर रहे हैं, जो दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय अपनी मेहनत और ईमानदारी से परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं।

सूरज धनपुरा अड्डे पर पंजाब नेशनल बैंक के सामने बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर लोगों के जूते पॉलिश करते हैं। यही उनकी रोजी-रोटी का सहारा है। अपनी शारीरिक असमर्थता के बावजूद वह प्रतिदिन काम पर पहुंचते हैं और मेहनत करके अपने बच्चों तथा परिवार की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।

मेहनत करने के बावजूद सरकारी राशन से वंचित सूरज

सूरज के संघर्ष की कहानी यहीं खत्म नहीं होती। आर्थिक रूप से कमजोर होने और दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद उन्हें सरकारी मुफ्त राशन योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

सूरज ने बताया कि उनके पास पीले रंग का राशन कार्ड है, जिसके आधार पर उन्हें सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से राशन खरीदने के लिए पैसे देने पड़ते हैं। उनका कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह आसानी से परिवार का खर्च और राशन का बोझ उठा सकें। कई बार अनुरोध करने के बावजूद उनका राशन कार्ड पात्रता के अनुसार परिवर्तित नहीं हो पाया है।

टूटी व्हीलचेयर के सहारे तय करते हैं रोजी-रोटी का सफर

सूरज की परेशानी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जिस पुरानी व्हीलचेयर के सहारे वह रोजाना काम पर पहुंचते हैं, वह भी अब काफी खराब हो चुकी है। हाथों से व्हीलचेयर चलाकर अपने काम तक पहुंचना उनके लिए बेहद कठिन हो जाता है। इसके बावजूद वह हिम्मत नहीं हारते और रोज अपनी आजीविका कमाने के लिए निकल पड़ते हैं।

सूरज की इच्छा है कि उन्हें बैटरी से चलने वाली ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराई जाए, ताकि वह बिना अधिक परेशानी के अपने काम पर आ-जा सकें और आत्मसम्मान के साथ मेहनत करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते रहें।

समाजसेवी मोहम्मद सलीम ने दिया हरसंभव मदद का भरोसा

इसी दौरान समाजसेवी मोहम्मद सलीम धनपुरा अड्डे पर पहुंचे। उन्होंने सूरज से अपने जूते पॉलिश कराए। बातचीत के दौरान जब उन्हें सूरज की संघर्षपूर्ण जिंदगी, आर्थिक स्थिति और सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलने की जानकारी हुई तो वह भी भावुक हो उठे।

मोहम्मद सलीम ने सूरज की मेहनत और हौसले की सराहना करते हुए उन्हें भरोसा दिलाया कि वह अपनी ओर से हरसंभव प्रयास करेंगे, ताकि सूरज को बैटरी से चलने वाली ट्राइसाइकिल उपलब्ध हो सके और उनके राशन कार्ड से जुड़ी समस्या का भी समाधान कराया जा सके।

उन्होंने कहा कि सूरज जैसे मेहनती और स्वाभिमानी व्यक्ति समाज के लिए प्रेरणा हैं। दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद वह किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय मेहनत करके अपने बच्चों का पेट पाल रहे हैं। ऐसे व्यक्ति की मदद करना केवल सामाजिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि हमारा मानवीय कर्तव्य भी है। वह सूरज को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने और उनकी जरूरत के अनुसार सहायता उपलब्ध कराने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।

एसडीएम और जिला पूर्ति अधिकारी से लगाई मदद की गुहार

समाजसेवी मोहम्मद सलीम ने एसडीएम हरिद्वार और जिला पूर्ति अधिकारी से मांग की है कि सूरज की आर्थिक एवं पारिवारिक स्थिति का उचित सत्यापन कराया जाए और सरकारी नियमों के अनुसार उन्हें पात्र राशन कार्ड का लाभ दिलाया जाए, ताकि उनके परिवार को खाद्य सुरक्षा योजना का लाभ मिल सके।

इसके साथ ही उन्होंने जिला प्रशासन और समाज कल्याण विभाग से भी अपील की है कि सूरज की शारीरिक स्थिति और आजीविका की कठिनाइयों को देखते हुए उन्हें प्राथमिकता के आधार पर बैटरी से चलने वाली ट्राइसाइकिल उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए।

प्रशासन से बड़ा सवाल: क्या मेहनत करने वाले जरूरतमंद को उसका हक नहीं मिलना चाहिए?

आज सूरज की कहानी समाज और प्रशासन दोनों के सामने एक अहम सवाल खड़ा करती है। जब एक व्यक्ति दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद भीख मांगने के बजाय मेहनत करके अपने परिवार का पेट पालने का प्रयास कर रहा है, तो क्या ऐसे जरूरतमंद व्यक्ति को सरकारी योजनाओं का लाभ और आगे बढ़ने के लिए जरूरी सहायता नहीं मिलनी चाहिए?

सूरज को केवल सहानुभूति या आश्वासन की जरूरत नहीं है। उन्हें जरूरत है एक ऐसे सहारे की, जो उनकी मेहनत को आसान बनाए, उनके आत्मसम्मान को बनाए रखे और उनके परिवार की जिंदगी को थोड़ा बेहतर कर सके।

सूरज जैसे लोगों को दया नहीं, अवसर और उनका अधिकार मिलना चाहिए। अब देखना यह होगा कि प्रशासन उनकी आवाज कब सुनता है और उनकी जिंदगी को आसान बनाने के लिए कब ठोस कदम उठाता है।

 

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