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गिरफ्तारी के लिखित आधार नहीं बताए तो पुलिस अधिकारी पर होगी विभागीय जांच: सुप्रीम कोर्ट

अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को लिखित रूप में और उसकी समझ वाली भाषा में गिरफ्तारी के आधार बताना अनिवार्य

By गुलज़ार अहमद | Wednesday, 23 Sep 2026 Global Star News
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(रिपोर्ट: गुलज़ार अहमद)- (नई दिल्ली, 21 सितंबर 2026। सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो ऐसी गिरफ्तारी असंवैधानिक और गैरकानूनी मानी जाएगी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि इस संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच शुरू की जानी चाहिए।

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंद्रकुर की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार की जानकारी लिखित रूप में देना अनिवार्य है। यह जानकारी ऐसी भाषा में होनी चाहिए जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझता हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है।

लिखित आधार नहीं दिए तो गिरफ्तारी असंवैधानिक

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि गिरफ्तारी के समय लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो गिरफ्तारी और उसके बाद की हिरासत असंवैधानिक हो जाती है। ऐसे मामले में आरोपी को तत्काल राहत देने का सवाल उठता है और संबंधित पुलिस अधिकारी की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।

दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति की पहली गिरफ्तारी अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के कारण गैरकानूनी घोषित हो जाती है और जांच एजेंसी उसे दोबारा गिरफ्तार करना चाहती है, तो पुलिस सीधे उसे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती।

पहले आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध कराने होंगे। इसके बाद संबंधित मजिस्ट्रेट से दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति लेनी होगी। आवेदन में यह भी स्पष्ट करना होगा कि दोबारा हिरासत की आवश्यकता क्यों है और पहली बार संवैधानिक प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं हो सका।

जांच दूसरे अधिकारी को सौंपने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक स्तर पर भी पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही तय की है। कोर्ट के अनुसार, यदि किसी आरोपी को अनुच्छेद 22 के उल्लंघन के कारण रिहा किया गया है और बाद में उसकी हिरासत के लिए अनुमति मांगी जाती है, तो वरिष्ठ अधिकारी को मामले की आगे की जांच किसी दूसरे पुलिस अधिकारी को सौंपनी होगी।

साथ ही, जिस अधिकारी ने गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराए थे, उसके खिलाफ विभागीय जांच का निर्देश देना होगा। यदि जांच में अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष सामने आते हैं तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी और कार्रवाई का उल्लेख उसके सेवा अभिलेख (Service Record) में भी किया जाएगा।

24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी

पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की संवैधानिक आवश्यकता पर भी जोर दिया।

कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के बाद निर्धारित समय के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के प्रावधान का सख्ती से पालन होना चाहिए। यदि अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन होता है तो परिस्थितियों के अनुसार हाईकोर्ट सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा देने का निर्देश भी दे सकते हैं।

जसकरणजीत सिंह की गिरफ्तारी से जुड़ा था मामला

यह फैसला शिरोमणि अकाली दल से जुड़े मुल्लांपुर दाखा विधानसभा क्षेत्र के प्रभारी जसकरणजीत सिंह की गिरफ्तारी से जुड़े मामले में आया। उन्हें नाबालिग से यौन अपराध के आरोपों से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी के समय उन्हें गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए गए थे। इसी आधार पर उनकी गिरफ्तारी को गैरकानूनी घोषित किया गया। सिंह ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

गंभीर आरोप होने से संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं होते

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक सुरक्षा के महत्व को रेखांकित किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, इससे संविधान में दी गई सुरक्षा समाप्त नहीं हो जाती।

अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए संविधान और कानून में जो प्रक्रिया निर्धारित है, उसका सख्ती से पालन करना आवश्यक है। संवैधानिक प्रावधानों का पालन अपराध की प्रकृति या गंभीरता के आधार पर अलग-अलग नहीं किया जा सकता।

सभी राज्यों के DGP को भेजी जाएगी फैसले की प्रति

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले की प्रति सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों (DGPs) को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि फैसले में निर्धारित संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जा सके।

 

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